बहुत ख़ूबसूरत होते हैं कविता के गाँव पर यहाँ कभी -कभी रुदन की आवाजें क्यों.आती हैं ,यूँ लगता है बहुत घुटन के बाद दबी- दबी आवाज में कोई गुहार रहा है|
पाकिस्तान की सिंधी लेखिका अतिया दाऊद के काव्य में भी यही गुहार सुनाई देती है|कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद किया है सुप्रसिद्ध लेखिका देवी नगरानी ने नाम दिया "थका हुआ सच"
पाकिस्तान की सिंधी लेखिका अतिया दाऊद के काव्य में भी यही गुहार सुनाई देती है|कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद किया है सुप्रसिद्ध लेखिका देवी नगरानी ने नाम दिया "थका हुआ सच"
सच हमेशा कड़वे होते
हैं पर थके
हुए भी होते
हैं यह पाकिस्तान
की सिंधी लेखिका
अतिया दाऊद की
कविताओं को पढ़
कर ज्ञात हुआ।
अपने वजूद का
आधार वे सच
को मानती हैं।
जब लाख चीखने
-चिल्लाने के बाद
भी सत्य साबित
नहीं हो पाता
तो वह थक
जाता है ,पर
सच कितना भी
थक जाये वह
गुहार लगाना बंद
नहीं करेगा। जब
भी किसी के
हक़ को कुचलने
का प्रयत्न किया
जाता है तब
-तब एक ज्वालामुखी
तैयार होता है और
जो वक्त आने
पर जरूर फटता
है। अतिया की
इन आवाजों को
हम तक देवी
नागरानी जी ने
बड़े ही परिश्रम
से अनुवाद के
द्वारा पहुँचाया है। अनुवादक
का काम लेखक
से किसी भी स्तर
में कम नहीं
होता। स्त्री विमर्श
के नये आयाम
प्रस्तुत करने वाली
यह पुस्तक साहित्यिक
धरातल पर अपना
विशेष स्थान रखती
है।
पाकिस्तान की कुछ
उर्दू लेखिकाओं के
अफ़साने और नज्में
पढ़ी हैं जिनमें
सारा शगुफ्ता ,किश्वर
नाहिद ,तहमिना दुर्रानी ,अख्तर
जमाल ,जाहिदा हिना
,परवीन शाकिर जैसी कलमकार
शामिल हैं। इन्होंने
जब लिखा तो
वर्षों से तहखानों
में बंद औरत
के लिये दरीचे
खोल दिये,अब
तो बाकायदा ऐसी
राह बना दी
गई है कि
वह दरवाजे के
बाहर निकलकर वह
अपनी राह ढूंढ
सके ,खुद की
पहचान बना सके।
इसी कड़ी में
करांची की सिंधी
लेखिका अतिया दाऊद ने
औरत को उसका
वजूद पहचानने के
लिये एक आईना
इस किताब के
रूप में दिया
है। उनके जज़्बात
जलते हुए अंगारे
है ,दहकते हुए
शब्दों में वे
औरत के हालात
बयान करती हैं
और इनसे कब
तक समझौता किया
जाये प्रश्न उठाती
हैं। औरत भी
इंसान है पर
पुरुष ने अपनी
मिल्कियत मान उन्हें
क्या क्या नाम
दे दिया -
तुम इंसान
के रूप में
मर्द
मैं इंसान के रूप
में औरत
'इंसान 'अक्षर तो एक
है
पर अर्थ तुमने
कितने दे डाले
मेरे जिस्म की अलग
पहचान के जुर्म
में
एक इंसान
का नाम छीनकर
और कितने नाम दे
डाले
मैं बीवी हूँ
,वेश्या हूँ ,महबूबा
हूँ ,रखैल हूँ
तुम्हारे लिये हर
रूप में एक
नया राज हूँ
जेल की सलाखों
पर सर पटक-पटक कर
थक जाने के
बाद उसे पूरी
ताकत से जब
तोड़ने का प्रयत्न
किया जाता है
वही प्रयत्न हमें
अतिया की कविताओं
में दिखाई देता
है। उनकी दृष्टि
में प्यार बंधन
या गुलामी नहीं
बल्कि समानता का
नाम है वे
अपने प्रियतम से
यही कहते हुए
दिखाई देती हैं
कि
मुझसे चाँद के
बारे में बात
न करो
मेरे महबूब मुझसे वो
बातें करो
जो दोस्तों से करते
हो
वे चाहती
हैं प्यार फूल
और खुश्बू की
तरह हो। इस
प्यार के लिए
औरत तरस जाती
है पर उसे
नहीं मिलता ,मिलता
है तो प्यार
के नाम पर
बन्दर और मदारी
का रिश्ता मिलता
है। मर्द का
मालिकाना हक़ औरत
के लिए
उन्हें पसंद नहीं
,औरत कोई सामान
नहीं जीती -जागती
इंसान है। सदियों
से चली आ
रही इस प्रथा
के कारण औरत
अपनी पहचान खो
चुकी है। उसे
बचपन से ही
कुछ इस प्रकार
से सिखाया -समझाया
जाता है जिसमें
उसका अस्तित्व नगण्य
होता है। औरत
समाज और मर्द
के हाथ की
कठपुतली मात्र बनकर रह
जाती है -
दुनिया में आँख
खोली तो मुझे
बताया गया
समाज जंगल है
,घर एक पनाह
है
मर्द उसका मालिक
है और औरत
उनकी किरायेदार
करती है
बरसों से चली
आ रही इन
परम्पराओं को वे
तोड़ना चाहती हैं।
अपनी बेटी को
वे जो बताती
हैं उसके
अनुसार वे अगली
पीढ़ी से बदलाव
की उम्मीद रखती
हैं -
अगर तुम्हें 'कारी 'कह
कर मार दें
मर जाना ,प्यार जरूर
करना
शराफत के शोकेस
में
नकाब ओढ़
मत बैठना
प्यार जरूर करना |